● बस में बहस ●

आज दोपहर बाद, अलवर से आई हरियाणा रोडवेज की खाली-सी बस में इफ्फको चौक, गुड़गाँव से फरीदाबाद की सवारियाँ बैठी।

रास्ते में चैकिंग वालों ने बस रोकी। सवारियों की टिकट जाँचने लगे।

एक बुजुर्ग टिकट माँगने पर बोला कि कण्डक्टर को पैसे दे दिये थे पर उसने टिकट नहीं दी। सहयात्री और कण्डक्टर बोले कि ताऊ टिकट दी है। आप अपनी जेब में देखो। बुजुर्ग फिर बोले, और बोलते रहे कि पैसे ले लिये पर टिकट नहीं दी। चैकिंग वालों द्वारा टोकने पर अपने बच्चों की कसम खाने लगे। सहयात्री बोलते रहे कि ताऊ अपनी जेब में देखो पर बुजुर्ग किसी की सुनने को तैयार नहीं। कण्डक्टर के लिये स्थिति कठिन बनती जा रही थी। कण्डक्टर ने भी अपने बच्चों की कसम खाई।

जाँच वाले बोले कि ताऊ बिना टिकट यात्रा के लिये जुर्माने के पाँच सौ रुपये निकालो और बस से नीचे उतरो। बुजुर्ग कुछ ढीले पड़े। टिकट के पैसे काट कर कण्डक्टर द्वारा लौटाये बाकी पैसे जेब में से निकाले।

उन पैसों के बीच में टिकट रखी थी।


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“मैं यह क्या कर रही हूँ?”

## सन्दर्भ : एक व्हाट्सएप समूह, De-Domestication (अ-पालतू बनाना) में 13 फरवरी को एक मित्र द्वारा भारत अथवा दक्षिण एशिया क्षेत्र की 2042-43 में स्थिति के अनुमान के लिये पाँच-दस वर्ष के खण्डों में आंकलन के प्रयोग की आवश्यकता की कुछ बातें।

●● विद्यमान सकारात्मक लगती सम्भावनाओं में योगदान के लिये भारत अथवा एशिया जैसे अखाड़ों में किसी बात को देखना/रखना अपर्याप्त ही नहीं बल्कि बाधक और हानिकारक लगता है। पिछले कम से कम पाँच सौ वर्ष, वर्तमान, और निकट भविष्य (दो-चार वर्ष) के सन्दर्भों में विश्व एक न्यूनतम ईकाई लगता है।

एक उदाहरण के तौर पर मजदूर समाचार के जनवरी 2013 अंक से “मार्च 2016 में” यहाँ प्रस्तुत है।

[●● निकट भविष्य की एक कल्पना

1980 से फैक्ट्री मजदूरों को दुनिया में नये समाज का वाहक देखना आरम्भ किया। ग्वालियर, इन्दौर, और भोपाल में छुट-पुट प्रयास। उत्तर भारत के प्रमुख औद्योगिक नगर फरीदाबाद से 1982 में मासिक “फरीदाबाद मजदूर समाचार” का प्रकाशन आरम्भ। इन चालीस वर्ष में मजदूर समाचार के प्रत्यक्ष दायरे में दिल्ली में ओखला औद्योगिक क्षेत्र, उद्योग विहार गुड़गाँव, आई.एम.टी. मानेसर, और फरीदाबाद के फैक्ट्री मजदूर रहे हैं।

1970 से उत्पादन में इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रवेश ने बहुत तेजी से पूरे संसार को फैक्ट्री-मय बनाना आरम्भ किया। वैश्विक मजदूरों की धड़कनें सन् 2000 से मजदूर समाचार में भी प्रकट होने लगी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में 2010-2012 के दौरान फैक्ट्री मजदूरों की हलचलों ने मजदूर समाचार की कल्पनाओं को पँख दिये। जनवरी 2013 का मजदूर समाचार का पूरा अंक सुखद कल्पना, “मार्च 2016 में” से भरा है।

इधर वैश्विक लॉकडाउन और डर की महामारी ने समय को और जीवन्त बना दिया है।

मजदूर समाचार के जनवरी 2013 अंक की लिन्क :


— 18 सितम्बर 2021

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●● Questions For Alternatives (8)●●

(Translation of a January 2000 write-up)

● Heights and their vertiginous attraction

Eulogies of excellence. Creating aspirations to reach the top. Encouraging an upward ascent: higher, topmost, more peaks to conquer … All of this seems natural because it faithfully mirrors the ladder-like, pyramidal, hierarchical structure of our present. The present is, in fact, the supreme embodiment of such an arrangement.

Whereas, what seems far more natural are minor differences, wherein ‘A’ happens to be marginally better at something while ‘B’ is just a shade less or more capable at something else, and so on. These unimportant differences between persons and personalities lend themselves to a panorama of multi-faceted interactions; they form the basis for relations of “Not As Unequals” amongst humanity.

# Audience and Artists: Born of Pain

Hierarchical social systems engender meaningless, tedious, boring and harmful work, and too much of it. Consequently, a majority of humanity is forced into working. This takes place, as it is bound to, in an atmosphere of lies, deceit, misinformation, maneuvers, and force. There is no choice but to steal away from reality and dwell in an imaginary world, the world of entertainment where pathologies of adventure, excitement, or devotion are born. The audience/listener and the artist/performer is born.

# Extremes of the ladder

Thus, begins the process of converting minor natural human differences into ladder like gaps of the order of tens, hundreds, thousands, and millions. The painful process of stretching and restricting, that must push or pull people into slots, continues. Most people are bound by the shackles of food, clothing, and shelter. Burden of work and lack of resources push them to the lowermost rungs of the ladder. These are the rungs that form the majority of the audience.

The greed for earning awards and honours inspires an ascent that makes stepping stones of other people. The rewards of competition and the fears of punishment in every conceivable sphere “force” people to constantly mould and chisel themselves. After all, a person can ensure his/her place in the pyramid only by making the difference between self and the rest of humanity as great as possible — increasing the difference of hundreds to thousands, and those of thousands to millions. The measure of a great or successful artist is the number of heads s/he has been able to climb over.

# The inferior and the anti-human

Increasing sophistication in this process simply turns an increasing number of people into an audience. They find themselves inferior in front of the great artists. Feelings of inferiority discourage and demoralise. And what pleasure does the artist derive from all this anyway? The fundamentally anti-human pleasure of scrambling upwards over others!

The question for alternatives is not whether someone has reached the top by talent, sincerity, hard work, and honesty or by dishonesty, manipulation, and stratagems. Instead, deliberations on the audience/artist dichotomy itself can be points of departure for alternatives.

[From March 1999 issue of Majdoor Samachar, a series, “Questions for alternatives” was started. The above is from January 2000 issue, number 8 in that series. Some of the pieces were translated and published as a booklet in December 2003.

In these twenty years very significant changes seem to have taken place. The global lockdowns from March 2020 seem to have taken our vibrant times onto a new terrain. By increasing their possibilities, the all-round acceleration in social churnings seem to have brought radical social transformations to the top of the human species’ agenda.]

— 10 February 2022

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●● An Interaction With A Friend In Vietnam Regarding Children●●

(A friend sent a translation of a write-up from the November 2007 issue of Majdoor Samachar to Minh in February 2021. Her response of 21 February 2021 is part of Chapter 11 of “Fragments & Pathways For Imagining a Near Future”. Follows.)

● For the normal, healthy upbringing of a toddler, fifty people of different age groups are essential. A prevalent proverb in Africa : for a good childhood, an entire village is needed.

[Minh: Do you have any research supports to the amount of about 50 people mentioned here? It sounds to me that the more diversified group, the better effect to the kids. Kids are always curious and the more conversations they have with varied people in ages or genders, the more experienced they can acquire. So in which way they conclude that about 50 people are required for their nurturing and development? And is there any requirement for these 50 people in specific or frequent connection that support to the idea? Since it is likely that even there is less than 50 closely frequent people around, total of people that a kid deal with during their childhood may be thousands or more.

In the book Nation of Israel (Author: Nguyen Hien Le), It was mentioned about the group called Kibboutzm were being created after the country became independent and kids were
raised independently with their parents in a group and they were being cared by teachers or caregivers. Group’s creation was based on the demand of hard-working and busy parents that wanted to spend more time for common jobs. After that the children nurturing has been changed a bit to be adaptive with society’s development and awareness. But it seems the groups had worked well in a way…]
—– Link:



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● चिकित्सा, चिकित्सक,और चिकित्सालय मानव तन के अनुकूल हैं क्या? सारत: यह मन के फेर तो नहीं हैं कहीं?●

यहाँ इस अथवा उस पद्धति की नहीं बल्कि सब चिकित्सा पद्धतियों की बात करेंगे।

# मनुष्य प्रजाति के जीवन काल के इस पाँच प्रतिशत दौर में ही विभाजित समाजों से, ऊँच-नीच के सामाजिक गठनों से हमारे पूर्वजों का तथा हमारा वास्ता पड़ा है।

बँटने के प्रारम्भ में ही “मैं” का उदय हुआ लगता है। बँटे हुये समाज में “मैं” के साथ संग-संग “मन” आया लगता है। मैं और मन सामाजिक गठन लगते हैं और बदलते आये लगते हैं। तन अलग-अलग इकाई हैं हालांकि यह एक-दूसरे से जुड़े तथा परस्पर निर्भर हैं। तन के स्थान पर मन के प्रभुत्वकारी बनने की प्रक्रिया बढती आई लगती है। तन को मन द्वारा हांकने की स्थिति। और, इधर तो एक मैं में कई मैं की स्थिति सामान्य बन गई लगती है। Atomised selfs and multizoid individuals.

तन और मन के इन विकट सम्बन्धों ने समाज के बँटने के आरम्भ में ही इनके योग की आवश्यकता उत्पन्न की। योग का अर्थ जोड़ना। अलग हुओं को जोड़ने की बात उभरी।

# स्वामी और दास को समाज में पहला विभाजन कह सकते हैं।

दासों के तन और मन दोनों पीड़ित। स्वामियों के तन तो कम पीड़ित पर मन अत्यंत पीड़ा में। भारतीय उपमहाद्वीप में रामायण तथा महाभारत ग्रन्थों को स्वामियों के मन की पीड़ा के प्रतिनिधि उदाहरण ले सकते हैं।

दासों के तन-मन की पीड़ा निश्चित मृत्यु के दृष्टिगत भी अकेले दास के जंगल में भाग जाने में भी अभिव्यक्त होती थी। ऐसे भागे दास के पकड़े जाने पर उसे भूखे शेर के सामने छोड़ने की प्रथा यूनान में थी। और, बन्दी बनाये दास को भूखे शेर के सामने छोड़ने का प्रदर्शन दासों में भय बैठाने तथा स्वामियों के मनोरंजन के लिये किया जाता था। युद्ध-रूपी खेलों के ओलम्पिक की जड़ें यह लगती हैं। आधुनिक ओलम्पिक में परिवर्तन यह हुआ लगता है कि परपीड़ा आनन्द व्यापक हो गया है। और, बात बहादुरों द्वारा “अपने-हमारे” को इक्कीस तथा “दूसरों” को उन्नीस दिखाने ने महामारी का रूप ले लिया लगता है।

दासों की सामुहिक गतिविधियों के बढने पर रोम के एक स्वामी सेनापति ने रोम से कापुआ नगर मार्ग पर छह हजार दासों को सूलियों पर टाँग कर मृत्युदण्ड दिया था। क्रूरता दासों को पालतू बनाने में असफल। स्वामी शास्त्रीयों के शान्ति और अहिंसा के उपदेश भी दासों को पालतू बनाने में असफल। स्वामी शास्त्रीयों द्वारा रचे धर्म और नये रचित धर्म भी असफल। यह रोम और भारतीय उपमहाद्वीप में पर्याप्त स्पष्टता लिये लगते हैं। ऐसे में स्वामी समाज व्यवस्था को सामन्ती समाज व्यवस्था ने प्रतिस्थापित किया। दासों के स्थान पर भूदास।

योग की अनेक पद्धतियों का आविष्कार तथा पालन-पोषण भारतीय उपमहाद्वीप में स्वामी शास्त्रियों द्वारा किया गया। और, स्वामियों का एकाधिकार योग पद्धतियों पर भी रहा जिसे उनके पश्चात अनेक सामन्तों ने सहर्ष स्वीकार किया। विज्ञान के रथ पर सवार हो कर आया व्यापार, और विशेषकर मजदूर लगा कर मण्डी के लिये उत्पादन, आरम्भ में योग-वोग से बिदका रहा। विज्ञान आधारित चिकित्सा पद्धति नया ईश्वर-अल्लाह-गाॅड। इधर हर क्षेत्र में विज्ञान और विज्ञान-आधारित तकनीकी समाधानों को अधिक से अधिक हानिकारक पाया जाने लगा है। ऐसे में वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति की विश्वव्यापी धन्धे में प्रभुत्वकारी भूमिका के बावजूद, योग आदि फिर उल्लेखनीय बनने की राह पर लगते हैं।

# स्वामी समाज को प्रतिस्थापित कर उभरी ऊँच-नीच वाली सामन्ती समाज व्यवस्था के आरम्भ के सम्राटों में चन्द्रगुप्त को एक प्रतिनिधि उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं।

साम-दाम-दण्ड-भेद में निपुण चाणक्य के निर्देशन में चन्द्रगुप्त सम्राट बनने में सफल हुये थे। और फिर, सम्राट बने रहने के लिये कुटिल चाणक्य के निर्देशन में चन्द्रगुप्त को वही सब जारी रखना पड़ा था। नींद में भी चैन नहीं। प्रतिदिन शयनकक्ष बदलना। पुरुषों के स्थान पर स्त्री पहरेदार रखना।

सम्राट चन्द्रगुप्त के मन की पीड़ा असहय हो गई। राजपाट छोड़ कर वे जैन भिक्षु बन गये। बिहार में पाटलिपुत्र से निकल कर चन्द्रगुप्त तेइस सौ वर्ष पहले दो हजार किलोमीटर पैदल चलते-चलते आज के कर्नाटक राज्य के चन्द्रगिरि पर्वत पर पहुँचे थे। तब भी उनके मन की पीड़ा असहनीय बनी रही। ऐसे में अन्न-जल त्याग कर उन्होंने आत्महत्या की। उस समय चन्द्रगुप्त की आयु बयालिस वर्ष थी।

भारतीय उपमहाद्वीप में सामन्तवाद के अन्तिम समय के लिये बादशाह औरंगजेब को प्रतिनिधि उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं। अपने पिता को कैद कर और भाइयों की हत्या कर औरंगजेब बादशाह बना था। भूदासों की सामुहिक गतिविधियों के कारण जीवन-भर औरंगजेब को खुली तलवार हाथ में थामे रखनी पड़ी : एक छोर पर मराठा भूदास, आगरा के पास जाट भूदास, पंजाब में खालसा पंथ धारण किये भूदास …। 1757 में प्लासी युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी की विजय उपमहाद्वीप में सामन्तवादी समाज व्यवस्था का स्थान मण्डी समाज व्यवस्था द्वारा लेने का आरम्भ थी। बेगार प्रथा के स्थान पर दस्तकारों तथा किसानों द्वारा मण्डी में बेचने के लिये उत्पादन।

# जन्म के पश्चात मृत्यु स्वभाविक। और, ऊँच-नीच वाले समाज में उल्लेखनीय तौर पर मृत्यु ही अस्वीकार्य बनी!

# कुछ अनुमान। गप्पें लग सकती हैं। गप्पें कह सकते हैं। परन्तु यह अनुमान विज्ञान आधारित हैं। आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के यह आंकलन समकालीन वैज्ञानिकों में स्वीकार्यता में प्रथम स्थान रखते हैं।

— पृथ्वी पर जल में जीवन का आरम्भ साढ़े तीन-चार अरब वर्ष पहले हुआ। जीवों में परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया।
— चालीस करोड़ वर्ष पहले ऐसे जीवों की उत्पत्ति हुई जो जल और थल, दोनों पर रहने लगे।
— पृथ्वी पर सात करोड़ वर्ष पहले जमीन पर घास उत्पन्न हुये।
— दो पैरों पर चलने वाले साठ लाख वर्ष पहले अस्तित्व में आये।
— दो-तीन लाख वर्ष पहले अफ्रीका में मानव प्रजाति अस्तित्व में आई। वहाँ से फैलने लगी।
— पचास हजार वर्ष पहले मानव प्रजाति अफ्रीका के संग-संग एशिया और यूरोप में भी।
— बारह हजार वर्ष पहले सब मानव कन्द-मूल बटोरने तथा शिकार पर भोजन के लिये निर्भर रहते थे।

:::: ज्ञानियों तथा विशेषज्ञों के जीवन को निर्देशों और आदेशों के अर्थ क्या हैं?

# दासों के तन-मन की पीड़ा के पहाड़, मिश्र में स्वामियों के कुख्यात प्रतीक, पिरामिड इस ऊँच-नीच वाले सामाजिक गठन में भी सत्ताधारियों ने पर्यटन स्थल बना रखे हैं।

— प्रारम्भ में मृत्यु को अस्वीकार करने वालों के उदाहरण के तौर पर मिश्र के स्वामी उचित लगते हैं।
— पाँच हजार वर्ष पहले मिश्र में हुये इमहोटेप (Imhotep) को विश्व में पहला चिकित्सक कहा गया है। मिश्र के स्वामियों को प्राचीन काल में सबसे स्वस्थ तथा उल्लेखनीय स्वास्थ्य सुविधाओं वाले कहा जाता है।
— प्राचीन चिकित्सा परम्परा के उल्लेखनीय वाहक बेबीलोन, चीन, और भारत के स्वामी भी कहे जाते हैं।

# आज की ऊँच-नीच का वाहक वाहन विज्ञान है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी की जुगलबंदी की उपज, मजदूर लगा कर मण्डी के लिये उत्पादन ने इस ऊँच-नीच को स्थापित किया।

— कहते हैं कि जर्मनी में वैज्ञानिक फ्रेडरिक सेरटर्नर ने अफीम के सत्व से 1804 में पहली आधुनिक औषधि, मोरफीन विकसित की।
— सौ वर्ष बाद, आसन्न युद्ध के दृष्टिगत बीसवीं सदी के आरम्भ में अनुसन्धान केन्द्रों की स्थापना ने वर्तमान में प्रभुत्वशाली चिकित्सा पद्धति को स्थापित किया।
— 1914-1919 में युद्ध के दौरान सेना के डॉक्टरों ने ट्रॉमा ट्रीटमेंट और सर्जरी की पद्धतियों में उल्लेखनीय विकास किया।
— फिर 1939-1945 वाले युद्ध के समय से विज्ञान आधारित आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जीवाणु, सूक्ष्म जीवों, बैक्टीरिया को रोगों के कारक और एंटीबॉयोटिक्स को, जीवाणुओं का-सूक्ष्म जीवों का विनाश करने वाली औषधियों के तौर पर प्रयोग को व्यापक बनाया। वैक्सीन और कीमोथैरेपी इसी कड़ी में।

# विज्ञान के कुछ और समकालीन अनुमान :

— एक युवा मानव तन में 30 ट्रिलियन, 3 नील (30,000,000,000,000) मानव सैल होते हैं।
— और, एक युवा मानव तन में 39 ट्रिलियन, 3 नील 90 खरब जीवाणु होते हैं। मानव सैल से अधिक सूक्ष्म जीव मानव तन में होते हैं।
— मानव मुख में ही 700 प्रकार के सूक्ष्म जीव रहते हैं।
— मनुष्य की चमड़ी पर ही 15 खरब जीवाणु रहते हैं।

:::: ज्ञानियों तथा चिकित्सकों के तन को निर्देशों और आदेशों के अर्थ क्या हैं?

# यह इसी लिये है कि विज्ञान आधारित चिकित्सा पद्धति से इधर एक रोग का उपचार अनेक रोगों का जनक बना है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा बनाई जाती औषधियाँ रोग उत्पादन की फैक्ट्रियांँ बन गई हैं।

# कुछ और समकालीन अनुमान :

— दस हजार वर्ष पहले पृथ्वी पर मानव प्रजाति की सँख्या 50 लाख थी।
— पाँच हजार वर्ष पहले मानव जनसंख्या 1 करोड़ 40 लाख।
— दो हजार वर्ष पहले 17 करोड़।
— एक हजार वर्ष पहले 31 करोड़।
— पाँच सौ वर्ष पहले संसार में जनसंख्या 50 करोड़।
— 1800 में विश्व जनसंख्या 98 करोड़।
— 1850 में जनसंख्या एक अरब 26 करोड़।
— 1900 में जनसंख्या एक अरब 65 करोड़।
— 1950 में जनसंख्या दो अरब 52 करोड़।
— 1970 में जनसंख्या तीन अरब 70 करोड़।
— 1990 में जनसंख्या पाँच अरब 32 करोड़।
— 2010 में विश्व की जनसंख्या 6 अरब 95 करोड़।
— 2020 संसार में मानव जनसंख्या 7 अरब 79 करोड़।

:::: मानव प्रजाति की ऐसी मात्रा के पृथ्वी के लिये क्या अर्थ हैं?

# अब के लिये विज्ञान आधारित बस इतने और समकालीन अनुमान :

— विश्व में 1900 में मानव प्रजाति की औसत आयु 32 वर्ष।
— 1950 में मनुष्यों की औसत आयु 48 वर्ष।
— 2020 में संसार में मानव औसत आयु 73 वर्ष से कुछ अधिक।
— भारतीय उपमहाद्वीप में 1800 में मनुष्यों की औसत आयु 25 वर्ष से कुछ अधिक।
— 1900 में यह औसत 22 वर्ष।
— 1945 में 33 वर्ष से कुछ कम।
— 1950 में भारत में मानव औसत आयु 34 वर्ष।
— 1970 में भारत में औसत आयु 46 वर्ष।
— 1990 में यहाँ औसत आयु 56 वर्ष से कुछ अधिक।
— 2010 में भारत सरकार के क्षेत्र में 65 वर्ष से कुछ अधिक औसत आयु।
— 2020 में भारत में औसत मानव आयु 71 वर्ष से कुछ कम।

:::: आयु में वृद्धि की मानव जीवन को अधिक जीवन्त बनाने में भूमिका है क्या?

# मृत्यु की अस्वीकार्यता सामाजिक मनोरोग है। ऊँच-नीच वाले सामाजिक गठनों में सत्ताधारियों में यह दीर्घकाल से है। इधर इसने सम्पूर्ण मानव प्रजाति को अपनी जकड़ में ले लिया लगता है।

## अंश में सम्पूर्ण अभिव्यक्त होता है।

— विज्ञान अंश का अध्ययन करता है। वैसी ही परिस्थितियों में उस अंश के अलग-अलग अध्ययन अगर उस अध्ययन जैसे ही परिणाम देते हैं तो अध्ययन को सही घोषित कर दिया जाता है।
— यह वैज्ञानिक पद्धति कहलाती है।
— विज्ञान को सत्य का वाहक कहा जाता है।
— विज्ञान द्वारा सिद्ध बातों पर प्रौद्योगिकी कार्य करती है।
— साइन्स और टैक्नोलॉजी की जुगलबंदी के प्रोडक्ट्स पर आज प्रश्न उठाना विगत में ईश्वर-अल्लाह-गॉड पर शंका समान चुनौतियांँ लिये है।

# जबकि, अंश में सम्पूर्ण पूरा अभिव्यक्त नहीं होता।

— विज्ञान के अध्ययन पर आधारित टैक्नोलॉजी को इच्छित सफलता प्राप्त करते पाया गया है।
— प्रश्न यह है कि यह इच्छित क्या है?
— विभाजित समाज में ये इच्छित सफलतायें इधर मजदूर लगा कर मण्डी के लिये उत्पादन के अनुकूल पाई गई हैं।
— इसलिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी वर्तमान में विश्व-भर में सत्ताधारियों के हितों की पूर्ति करती हैं। सरकारें तथा कम्पनियांँ साइंस और टेक्नोलॉजी का पालन-पोषण करती हैं।

# अंश के अध्ययन के परिणामों को अन्य अंशों तथा सम्पूर्ण पर लागू करने के विनाशकारी परिणाम आ चुके हैं। इसे साइंस और टेक्नोलॉजी की त्रासदी कहा जा सकता है। परन्तु, इसे मानव प्रजाति के संग अन्य जीव प्रजातियों की, सम्पूर्ण पृथ्वी की त्रासदी कहना अधिक उचित रहेगा।

— कीटनाशक दवाओं और बीजों में परिवर्तन द्वारा अनाजों की मात्रा में बहुत भारी वृद्धि की गई है। और, इस प्रकार के उत्पादन से बनता भोजन विष पाया गया है।
— सुरक्षा के क्षेत्र में अस्त्र-शस्त्रों की मारक क्षमता कल्पना से परे कही जा सकती है। और, यह सुरक्षा मानवों के लिये जानलेवा सिद्ध हुई है।

अंश के अध्ययन से अन्य अंशों के संग, सम्पूर्ण के साथ सौहार्द में वृद्धि के लिये ऊँच-नीच वाले सामाजिक गठनों के स्थान पर नई समाज रचना एक अनिवार्य आवश्यकता लगती है।

— 18 जनवरी 2022
मजदूर समाचार-कम्युनिस्ट क्रान्ति द्वारा प्रसारित

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● ई एस आई कॉरपोरेशन ●

11 जनवरी को वैक्सीन लगवाने ई एस आई अस्पताल गये पड़ोसी से 12 जनवरी को सुबह कुछ बातचीत हुई। रात बारह घण्टे की ड्युटी कर लौटे थे।

फैक्ट्रियों में प्रवेश के लिये वैक्सीन लगा होना अनिवार्य कर दिया है।

ई एस आई अस्पताल में बहुत भीड़। आठसौवाँ नम्बर। चार बजे नम्बर आया।

कोविड के समय से ई एस आई अस्पताल सर्वजन के लिये भी उपलब्ध करवाये गये हैं। फरीदाबाद में ई एस आई मेडिकल कॉलेज के गेट पर इंकलाबी मजदूर केन्द्र के लोग धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। माँग : ई एस आई के साधन सिर्फ मजदूरों के लिये होने चाहियें!

जबकि :

— इन दस वर्ष के दौरान ही हरियाणा राज्य की ही बात करें तो ई एस आई कॉरपोरेशन हरियाणा क्षेत्र से वर्ष में जो राशि एकत्र करता है उसका चालीस प्रतिशत हिस्सा ही खर्च करता है।

— ई एस आई कॉरपोरेशन के अपने नियमों के अनुसार जितने डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ ई एस आई डिसपेंसरियों तथा अस्पतालों में होने चाहियें उसके आधे से भी कम हैं।

— ई एस आई चिकित्सा केन्द्रों पर बीमार मजदूरों का इस-उस लाइन में घण्टों लगे रहना फरीदाबाद और गुड़गाँव में बरसों से रोज की बात है।

— मजदूर समाचार, 13 जनवरी 2021

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किसान आन्दोलन, 8 और 9 जनवरी 2022

● पहली जनवरी को व्हाट्सएप पर श्री सज्जन कुमार, महासचिव, प्रकृति-मानव केन्द्रित जन आन्दोलन से संगठन की पंजाब राज्य समिति द्वारा 8 और 9 जनवरी को पर्यावरण तथा कृषि के पतन के कारण चौतरफा संकट से रूबरू पंजाब के सन्दर्भ में कॉन्फ्रेंस की सूचना मिली।

इस से पहले श्री सज्जन कुमार से 25 दिसम्बर को व्हाट्सएप पर एक ऑडियो-वीडियो मिला था जिस पर 26 दिसम्बर को उन्हें हम ने अपनी रेस्पॉन्स भेजी थी।

8 जनवरी को मेरे संगरूर के पास मस्तुआना साहब जाने और कल रात फरीदाबाद लौटने के सन्दर्भ में यह देखें :

Sajjan Kumar Engg: https://youtu.be/9vdaTI1Jfy8

Sher Singh: सज्जन जी, व्हाट्सएप पर कल, 25 दिसम्बर को प्राप्त आपके 10 दिसम्बर के ऑडियो-वीडियो का एक अंश सुना। जीवन के इस चरण में इस सन्दर्भ में आपसे कुछ बातें कहना आवश्यक लगा है। आशा है कि आप किसी बात को अन्यथा नहीं लेंगे।

# आन्तरिक आपातकाल के समय आप लोगों से मेरे निकट सम्बन्ध बने थे। उस समय आप जोधपुर में इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र थे। आप लोगों ने उस समय के श्री गंगानगर जिले के गाँव-गाँव मेरा जाना सम्भव बनाया था। उसके बाद जालोर जिले के राजस्थान-गुजरात सीमा क्षेत्र के गाँव-गाँव मेरा जाना सम्भव बनाया था। फिर मैं राजस्थान से बाहर चला गया था।

उस समय क्रान्ति के लिये ग्रामीण गरीबों पर केन्द्रित रहने, किसानों और दस्तकारों में गतिविधियाँ वाली बात थी।

1979 में ग्रामीण गरीबों के स्थान पर शहरों में फैक्ट्री मजदूरों पर ध्यान केन्द्रित करने की बात आई तब मैं मध्य प्रदेश में चम्बल-कूनो-कुँवारी नदियों के जँगल-पहाड़ी क्षेत्र में सहरिया समूह के बीच था। फैक्ट्री मजदूरों के बीच रहने के लिये मैं ग्वालियर, फिर इन्दौर होते हुये भोपाल में बी एच ई एल फैक्ट्री पहुँचा था।

इन्दौर था तब राजस्थान में माही बाँध के निर्माण क्षेत्र में कार्यरत इंजीनियर मित्रों से मिलने गया था। मित्रों के नाम याद नहीं हैं। वे ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे और किसानों के बारे में कम्युनिस्ट घोषणापत्र की बातों पर उनका अचम्भित करने वाला आश्चर्य मेरी स्मृति में है।

# अलगाव के बाद 1982 से मैं फरीदाबाद में हूँ। मासिक मजदूर समाचार के इर्दगिर्द जीवन रहा है। इन चालीस वर्षों के दौरान फरीदाबाद के संग-संग ओखला औद्योगिक क्षेत्र, उद्योग विहार गुड़गाँव, इन्ड्स्ट्रीयल मॉडल टाउन मानेसर, और नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों से नियमित सम्बन्ध रहे हैं।

गिरधारी, आप और अन्य मित्रों का अहमदाबाद में फैक्ट्री मजदूरों के बीच जाना। ग्रामीण क्षेत्रों में लौटना। नीला झण्डा अपनाना। चुनावी राजनीति में भाग लेना आदि के बारे में मुझे कम ही जानकारी रही है।

# तीसेक वर्ष बाद आपके साथ उल्लेखनीय मिलना हुआ। तब आप “प्रकृति-मानव केन्द्रित जन आन्दोलन (Nature-Human Centric People’s Movement” के महासचिव थे।
और खेती-किसानी आपकी गतिविधियों में उल्लेखनीय लगी थी।

मजदूर समाचार के 2010 के मई अंक से “कुछ बातें किसानी-दस्तकारी की” और अगस्त अंक से “ग्रामीण गरीबों के खिलाफ नया युद्ध” को आपके ध्यान में लाने के प्रयास किये थे।

# इधर 2020-21 वाले “किसान आन्दोलन” के सम्बन्ध में आपकी धारणाओं तथा अतिसक्रियता ने 1980 में माही बाँध निर्माण क्षेत्र में इंजीनियर मित्रों की स्मृति को उभारा है। यह सब चालीस वर्ष बाद, जब किसानी खेती यहाँ सामाजिक मँच पर पृष्ठभूमि में चली गई है। और, दस वर्ष पहले माओवादी पार्टी के जेल में बन्द एक सिद्धान्तकार, कोबाड गांधी, सार्वजनिक लेख में विश्व-भर में किसानों को क्रान्ति का आधार मानने वाले संगठनों की स्थिति को अब pathetic (दयनीय) बताते हैं।

सज्जन जी, किसानों और किसानी के बारे में 14 नवम्बर 2020, 24 दिसम्बर 2020, 29 जनवरी 2021, 31 मई 2021को हिन्दी में प्रसारित सामग्री आपको भी भेजते रहे हैं। अँग्रेजी में जनवरी 2021 में “A Note on Peasants in the Indian Subcontinent” भी आपको भेजा था। किसी पर भी आपने रेस्पॉन्स नहीं दी। बस “किसान आन्दोलन” में लगे रहे हैं।

आशा है कि “किसान आन्दोलन” के स्थगित कर दिये जाने के बाद, अब आप लोग मजदूर समाचार की इस सम्बन्ध में बातों पर कुछ रेस्पॉन्स देंगे।

# 9 जनवरी को सुबह श्री सज्जन कुमार ने बताया कि उन्होंने उनके ऑडियो-वीडियो पर हमारी रेस्पॉन्स पढी ही नहीं थी।

Posted in In Hindi, आदान-प्रदान | Conversational Interactions | Comments Off on किसान आन्दोलन, 8 और 9 जनवरी 2022

● गुप्त : हर ऊँच-नीच के लिये महत्वपूर्ण●

कल, पाँच जनवरी 2022 को व्हाट्सएप पर एक मित्र द्वारा भेजी एक वीडियो पर कुछ आदान-प्रदान :

— बताया करें कि किस बारे में है।

: ये देख लीजिय ।

खुद पता चल जाएगा । शायद पहली वीडियो भेजी है आपको ।

ये मुस्त्रियों द्वारा मोबाइल को जासूसी में रखने के बारे में हैं

— सामान्य तौर पर आवश्यक जानकारी के बिना वीडियो नहीं देखता।

रही बात जासूसी की, बहुत पहले “नारद मुनि आतंकवादी घोषित” में इस चर्चा कर चुके हैं।

1982 से सड़कों पर खड़े हो कर मजदूर समाचार बाँटा है। It is revolutionaries and activists obsession with secrecy and in my reading besides being irrelevant, it is harmful. After Paris Commune, the First International was accused of being a secret organisation. Marx’s reply: The program and the rules of organisation of the First International are available for three and two pence.

: मैं तो पहले ही 33 करोड़ों की सर्विलेंस पर हूं । एक आध और भी लग जाएं माथा मारने ।

मस्त रहने का तरीका

— जी।
— और, सरकारों तथा कम्पनियों के गुप्तचर तन्त्र आवरण प्रस्तुत किये जाते हैं अधिकतर प्रभावित को विचार एवं निर्णय करने की प्रक्रिया से बाहर रखने के वास्ते।

Posted in आदान-प्रदान | Conversational Interactions | Comments Off on ● गुप्त : हर ऊँच-नीच के लिये महत्वपूर्ण●

Fragments & Pathways For Imagining a Near Future | Printed Copies Available


•Knowingly Doing Wrong •Parts Of A Journey •Some Factory and Area Reports •Man-Woman Relations •Peasants and Artisans in the Indian Subcontinent •An Interaction With Primitive Anarchists In 2012 •Framing Beyond Identity Politics •July 2017 Internationalists Meeting in Greece •Pandemic of Fear •Imagining A Near Future

It is a Majdoor Samachar-Kamunist Kranti publication.

The book can be taken from us in Faridabad. We can also send it by post. In the present scenario, it could be more convenient for some to self print the book.

No price.
No copyright.
Contributions welcome.
No amount will be less.

Posted in General, In English, Our Publications | Comments Off on Fragments & Pathways For Imagining a Near Future | Printed Copies Available

Towards a Conversation with Students

Re-thinking the Figure of the Worker
— Majdoor Samachar, 17.09.2013

Over the last 30-35 years, we have witnessed and have been connected with innumerable self-activities of workers. Even within these, there has been much that has stayed beyond our grasp, much has remained illegible to us. The electric self-activity of workers of Maruti Suzuki (Manesar) between 4 June 2011 and 18 July 2012 not only produced fresh energy and excitement, it also brought forth new questions. We want to share some of these with you today. The intensifying social churning that is apace in industrial areas surrounding Delhi demands reflection in practice; it calls upon us to breathe more creativity into our ways of thinking. We believe the workers of Maruti Suzuki have raised questions that are planetary in their significance.

A comrade who was engaged inside and outside a factory for 15 years, and then outside factories for another 15 years, said this in reference to the self-activity of the workers of Maruti Manesar:

‘Calling the self-activity of workers “the act of occupying” is a gross misunderstanding. What workers were doing was taking away the occupation of factories by companies and the government, weakening the control they have over factories.’

What the workers of Maruti Suzuki (Manesar) did between 4 and 16 June 2011 is extremely significant. What the workers of Maruti Suzuki, Maruti Engine, Suzuki Casting, Suzuki Motorcyle, Satyam Auto, Bajaj Motors, Endurance, Hilex, Lumax, Lumax DK, Dighania Medical factories did on 7 October is even more significant. These actions were not about civil or constitutional rights. Neither were they a strike. In Majdoor Samachar, we called it “workers’ occupation of factories”. To call what the workers did in June and October 2011 in IMT Manesar “occupation of factories by workers” is to see what the workers were doing through a reduced lens. “Occupation” is a misnomer; it is misleading. Occupation is how existing social hierarchies – based as they are on wealth and power – are held in place. Companies and governments today are on an overdrive to gain possession of everything not only on this planet, but also of all that exists in the entire universe. What we want is to wrest out of the clutches of companies and governments that which they have come to see as having a free reign over, and to create a commons. They want to occupy everything – cows, humans, land, houses, water, air. They are eager to occupy even the human heart. It is this greed to occupy that has brought us to the brink of disaster. Given this context, to call what workers of IMT Manesar did “occupation” is to refute the essence of their actions; it is akin to trampling over the possibilities they created. In conversations we have had with workers of Maruti Suzuki, they have abundantly expressed that between 7 and 14 October, when they unshackled the factory from the control of the management and government, they felt a joyousness of life that is usually unimaginable. The significance of what the workers of IMT Manesar did lies in it being a departure point from where on a series of de-occupations followed. Refracted through this lens, the significance of the “Occupy” movement that started in the US becomes clear – as actually being a movement calling for de-occupation, a taking away of the control that companies and governments have.

We shared this insight from our worker-friend in the February 2012 issue of Majdoor Samachar. It is commonplace to find some older methods insufficient in practice, to reject some of them, and to realise some methods are harmful. Practice makes it expedient to change and mould some methods, and to discard or turn away from some methods. An insight such as this comes from long years of practice and thinking. What is to be done, what avoided; how it can be done, and what should be steered clear of; constantly searching and inventing new methods; relentlessly testing diverse ways through practice – this is a continuous process, and the workers of Marusti Suzuki (Manesar) have given it a new velocity.

During the thirteen days – from 4 June 2011 to 16 June 2011 – when factories were de-occupied of the company and the government, it was as if people who had worked with each other for three, and perhaps four years, were seeing each other for the first time. In the words of a worker from Maruti Suzuki (Manesar):

“Inside the Maruti Suzuki factory, 7-14 October was the best time. No tension of work. No agonizing about the hours of entry and exit. No stress over catching a ride in a bus. No fretting about what to cook. No sweating over whether dinner has to be eaten at 7, or at 9 pm today. No anguishing over what day or date it is. We talked a lot with each other about things that were personal. All of us drew closer to each other than we have ever been before, during these seven days.”

Occupations are always wobbly. Steps are constantly underway for countering occupations. Time and again, the control that a company has over a factory is weakened in ways that can be called ‘de-occupation’. The temporary workers of Ametip Machine Tools in Faridabad, workers hired through contractor companies in Hero Honda Spare Parts factory in Gurgaon, permanent workers and workers hired through contractor companies, together, in Napino Auto & Electronics factory in IMT Manesar, have de-occupied factories of companies and the government. There are innumerable examples everywhere in the world of students having de-occupied schools, colleges and universities of governments. All over the world, weakening and removing occupation is on its way to becoming a widely practiced and common act. It’s so commonplace in fact, that factories of knowledge-production don’t even deliberate on whether it should be called “occupation” or “de-occupation”. Perhaps it isn’t considered worthy of deliberation, or maybe it just isn’t a point that can be debated academically. From occupy to de-occupy, from occupation to de-occupation is a conceptual leap. We feel that the idea of de-occupation is one of the results of our years of deliberation on unity vs. unison (ektaa banaam taalmel). Unique and together becomes conceivable. All and everyone’s comes into view.

# Point number two

The time during which occupation is diminished or removed is an active, alive time for those participating in its happening. It’s a time when many people exchange ideas with each other – without fear, without hesitation, and with leisure. Different angles are shared and mulled over. Many kinds of bonds are forged; new alliances are formed and deepened. And that which may have been considered beyond questioning, and stable stereotypes that may have otherwise been overlooked, begin to be brought up for questioning. Lively discussions about life stoke the fire of desires that seek simple alterations in the present and the near, foreseeable future. Thinking with that which can be brought into practice, people are freed from the vicious encirclement of demands.

With the de-occupation of Maruti Suzuki (Manesar), the sahibs found themselves confronted with an unsolvable riddle: What do workers want? What in the world is it that workers want?

Concessions hold meaning only when they can be mobilised, and they can be mobilised only in order to respond to demands. They are meaningless in the face of desires for life and joyous living. This is what 18 July brought. In brief:

Thirty workers were cajoled into submitting resignations. After that, with no further need to be egged on, the company offered what are called “concessions”. Reduction in speed – brought down from one minute to 45 seconds per car. Remuneration for trainees, apprentices and workers hired through contractor companies was increased. Permanent workers were assured of substantial wage increments over-term, three-year contracts. The number of buses was increased. Parents were included in health policies. Number of vacation days was increased. Heavy cuts in payments for absence of merely one or two days was ended. Workers would now no longer be arbitrarily asked to continue working after their duty hours. Workers hired through contractor companies would no longer be made to put in an hour and a half extra at the end of every night shift. A second union was registered, and it was given the status of a recognised union. Workers were assured residential quarters would be constructed for them, enough for all. A requisition was accepted from the union for long-term contracts, and follow-up discussions were promised.

If one were to consider the above-mentioned concessions within the framework of concessions, they would seem remarkable. However soon, and as early as February-March 2012, workers started feeling that despite everything that had happened, nothing had changed. Among the workers of Maruti Suzuki (Manesar), any kind of talk of concessions began to be called “the management’s language”. After everything they had brought about, if workers remained workers, then could anything be said to have changed at all? On 18 July, workers rebelled against being workers. Two things that symbolised that workers would be kept as, and in their place as, workers were attacked – managers and the factory buildings. It wasn’t a small group of 20-25 workers who were doing this. Old workers and new, permanent workers and those who were temporary, all participated in this together. It just happened to happen on 18 July – it could just as well have happened on 15th May or 25th August.

On 18 July 2012, workers challenged the customs that keep a worker labouring. The question, ‘what next?’, has become a live and vital question today. It is vigorously discussed among workers. A worker from Maruti Suzuki (Manesar) said, “It would have been quite something if what happened on 18 July had happened all across IMT.”

Today, when the ease with which a worker can be kept labouring is under duress, the questions of what comes next, of what can come after this, are questions that carry a force and a challenge for everyone, everywhere. Everyone, everywhere can participate in searching answers.

# Point number 3

How are factory workers reading the current circumstances and situation, what new kinds of interpretations are they bringing to bear on them, and how is this getting reflected in their practice and ways? This is very significant for understanding the challenges they have posed to power and the everyday changes that have resulted. Here are two examples, in brief:

1. On 14 October 2011, approximately 1600 permanent workers, trainees and apprentices gathered inside the Maruti Suzuki (Manesar) factory. Following an inspection of the factory by the police station head, administrative head of the district, the DC, accompanied by gunmen and 20-25 officials, arrived. Here is how a worker described the scene:

The DC walked around a little bit, then took his position in one place and started speaking. He said, you are good workers, you are educated, you have worked well the last five years, you have produced this much, you have contributed this much by bringing in tax, your salaries are better than those of others, your management is decent, you have been misled by some people, your occupation of the factory is unconstitutional, you must pay heed to the order that has been passed by the High Court, you will have to follow the order and vacate the factory, there is no other way, we won’t let you disregard law like this, Rico Auto lost a lot of orders when its workers got waylaid, if Maruti Suzuki were to shut down you would lose your jobs, but, moreover why should the government have to suffer losses?

The workers gave the DC their full attention for the half hour he spoke. But then the DC started telling a story, one that the workers had heard umpteen times from the management: The story of the tortoise and hare, only a little extended. The second time around, this version goes, the hare didn’t sleep, and he reached the finish line first. The third time around, even though the tortoise stopped for a drink of water on the way, he reached the finish line before the hare. The fourth time around, the route was sometimes even, sometimes treacherous, and water was needed as well, and sometimes the hare rode on the back of the tortoise, sometimes the tortoise rode on the hare’s back. Teamwork! The management and workers should walk together. The moment the DC started narrating this tale, workers started lying down, dozing off, chatting among themselves. At the end of his narration, the DC said that very soon he would arrange for a compromise with the management, but that for now the workers should follow orders. Then another official started waxing forth on law – that this is an illegal occupation, that we must vacate the factory. When the DC started to leave, a worker stepped up to where the mike was and said, ‘We heard you out, now you should listen to what we have to say.’ The DC stopped, but when workers started asking questions one after the other, he decided to leave. Workers now started shouting slogans, and when their shouting became a roar, the DC and his team pretty much scampered out of the factory.”

2. A worker hired through a contractor company in Maruti Suzuki (Manesar) was on duty in shift-B on 13 January 2012, when he received a phone call from a worker in Allied Nippon that a worker had sustained burns in a fire in the factory. The company had got him admitted in Sapna Nursing home, and the doctors had said that he would be released from the hospital by evening. Both his legs, from the thigh down, had been severely burned. The worker at Maruti Suzuki advised that the injured worker should be kept at the nursing home. The next day, on 14 January, a Saturday, 10-15 workers hired through contractor companies in the Maruti Suzuki factory went to the nursing home to visit the injured worker. When the doctor said that he was ready to release the injured worker, they asked him instead to continue treating him, and that they would cover the expenses if the company didn’t. No one from the management visited the nursing home on Saturday or Sunday, though, of course, workers did. When they called the production manager of Allied Nippon, he lied that he had no idea a worker had sustained burns at the factory. When workers went to the nursing home on Monday morning, the doctor said that if they didn’t pay the nursing home’s fee, the worker would be transferred to the Employees State Insurance Corporation hospital (ESI). The visiting workers called their colleagues, and within half an hour 70-80 workers from the press shop, assembly, paint shop and weld shop of Maruti Suzuki, and workers of Suzuki Powertrain hired through contractor companies gathered at the nursing home, from where they went together to Allied Nippon factory. They demanded to meet the manager. He refused to come out to discuss anything in connection with the injured worker. The workers assured him that he needn’t be scared, that he could talk to them from the safety of the other side of the gate, but he refused to meet them. The workers kept waiting, and when they had waited for half an hour, the supervisor of the contractor company, through whom the worker with burn injuries had been hired, arrived. A discussion ensued and it was decided that the expenditure of the nursing home till then would be borne by the company, that the injured worker would receive his wages for the duration of his recovery, and that his family would be informed by phone and brought here. He was shifted to the ESI hospital in Sector-3, IMT. For gaining admission into Emergency, the hospital demanded the worker’s ESI card, but one didn’t exist. The supervisor requested the doctor to give him two hours, and that is how an ESI card for a worker who had been working in that factory since 12.12.2010 got made on 16.1.2012. An accident report was filed. The injured worker’s father arrived from the village. It’s 24 January today; the worker continues to be treated at the hospital.

Durgesh, the worker of Allied Nippon factory who sustained injuries while at work, stays on rent in Baas village. The workers of Maruti Suzuki and Maruti Powertrain, who took steps after he sustained burns, live on rent in Aliyar and Dhana. None of them knew Durgesh before this incident. Unshackling the factory from the control of the company and the government twice in six months has kindled in the workers of Maruti Suzuki ways of thinking and feeling that exceed known and familiar bonds. Permanent workers and trainees de-occupied the factory of the company and the government between 7 and 14 October to insist that workers hired through contractor companies be retained. Workers of eleven factories in IMT stood alongside them through de-occupation. This has transformed the environment; all those who are strangers have become ones own.

# Point number 4

Lets look at another aspect. The speaking order that was passed by the Managing Director of Maruti Suzuki in August 2012 reflects the management’s terror of 18 July. But perhaps even more telling is what the speaking order betrays via the management’s views on ‘incitement to violence’ and ‘participation in violence’. Here goes: The Managing Director sent letters individually to 546 permanent workers. Each letter states, for every worker it addresses, that he both incited and participated in violence. This means the management sees every worker as an instigator as well as a participant.  And what this means is that the company recognises that each and every worker is a potential de-occupier. Even in the eyes of the management, every worker has today become the fountainhead of a destabilising force. The language of the leader and the led has lost its valence; it has become obsolete.

The self-activity of workers has blurred the partitions that separate intellectual labour from physical labour. It is time, therefore, that in order to participate in the creation of a new world, all of us take the cue and let go of long-held assumptions and settled theories.

# Point number 5

Instead of wrapping up with a conclusion, lets broaden the scope of our discussion some more. The young, 20-22 year-old workers of today often have work experience from 10-12 places under their belt. They exchange the wealth of experience and understanding and thinking that comes with this with each other, freely and rapidly. This is a global trend. Here is one worker’s trajectory – after tenth class examination in 2001, he started  working at the construction of Essar Steel factory in Hajira (Gujarat), then he worked at the construction of Gas Authority of India (Gail) plant at Bharuch (Gujarat), then at the construction of Jindal Steel & Power Works in Raigarh (Chhatisgarh), then at the construction of JSW Plant in Bellary (Karnataka), then at the construction of Jindal Stainless Steel Plant in Jajpur (Orissa), and then at the construction of Reliance Refinery in Jamnagar (Gujarat). These constructions are on ten square kilo metres to sixty square kilo metres land where ten thousand to a hundred thousand workers are employed. In 2013, instead of construction, he was working in a factory in NOIDA(UP).

We have already discussed the self-activity of workers in Maruti Suzuki (Manesar). And though little detail is known about the activity of workers in NOIDA on 20 February, everyone is aware that something quite extraordinary happened. It caused such alarm in Napino, Honda, Maruti-Suzuki and other factories in the Industrial Model Town Manesar (Gurgaon), that all the factories were closed by the managements the next day. We have discussed the activities of the workers in Okhla on 21 February 2013 in one of the issues of Majdoor Samachar. Here’s what a propagandist-thinker who would rather have existing and old ways continue ad infinitum said about 21 February: “It is understandable that when workers get angry, they can get violent. This anger can be reigned in through offering concessions. But what we saw in NOIDA and Okhla was different – the workers weren’t angry; they were enjoying being violent. This is an extremely problematic situation.”

Friends, it is time to let go of the image of tired, defeated and despondent workers. Our experience of factories in Faridabad, Okhla, Gurgaon and IMT Manesar urges us that we unfetter ourselves from these chains. And what we have seen in these factories is only a small glimpse of a transformation that is much more vast. In the course of six months, the workers of Maruti Suzuki (Manesar) were compelled to sign three agreements, but in their practice the workers saw them and treated them as meaningless scraps of paper. The image that is emergent today is that of workers who are filled with restlessness and are harbingers of a deep churning. This image challenges settled ways of seeing and thinking. Accept this challenge. This is an opportunity to shape the world anew, to think the world anew. This opportunity is for everyone. The events of 18 July 2012 have a place of immense significance in the chronology of events that have shaken the world recently. It emits a sense of the deep transformation the world is going through in our times. We are living in a time in which we can all stand up against prevalent ways and make them obsolete, more and more obsolete. It is for times like this that it has been said, “audacity, more audacity and still more audacity!”


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