● दस पन्ने की पुस्तिका●

# आपका, आप लोगों का अनुमान यह है। मेरा, हम लोगों का आंकलन यह है। बातचीत करते हैं। आदान-प्रदान करते हैं। आपको कुछ सही लगे तो उसे ले लें। जो सही नहीं लगे उसे छोड़ दें। ऐसा ही हम करेंगे।

इस प्रकार के अधिक उदाहरण हमारे सामने नहीं आये हैं।

# जबकि ऐसी बातें काफी व्यापक लगती हैं :
मैं और हम लोग सही। तू और तुम लोग गलत। चित-पट। वाद-विवाद। बहस। वाक् युद्ध। शास्त्रार्थ।

अनेक थाणेदारियों की यह एक अभिव्यक्ति लगती है।

# ऐसे में इस दस पन्ने की पुस्तिका में बातचीत के लिये, आदान-प्रदान के लिये कुछ सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास हम ने किया है। छपी प्रतियाँ हम से ले सकते हैं। पुस्तिका की पीडीएफ के लिये लिन्क है :

https://drive.google.com/file/d/1iy9w3VEMKWcesFS8iD4F7_lhOAZScIBP/view?usp=sharing

# ऊपर दी सामग्री अपने-अपने तौर पर पढ कर पाँच-दस लोग मिलें तो, लगता है कि बातचीत के लिये आरम्भिक प्रस्तुति वाली कठिनाईयों से पार पाना सम्भव होगा। कोई वक्ता वक्तव्य प्रस्तुत करे वाली बात नहीं रहेगी। प्रश्न करने वालों और उत्तर देने वालों वाले विभाजन को पाटने की सम्भावना लगती है। समझानेवालों और समझनेवालों की दलदल के पार जाना सम्भव लगता है।

# अपनी-अपनी बातें रखना। यहाँ किसी के आंकलन के सही अथवा गलत होने वाली बात नहीं है। बात स्थिति को पढने की होती है। कोई भी अनुमान एक रीडिंग होता है। और यह पढना अनुभवों के आंकलनों पर आधारित होते हैं। एक ही अनुभव से गुजरे व्यक्तियों के उस अनुभव के भिन्न, बहुत भिन्न, विपरीत तक अनुमान होते पाये जाते हैं। इसलिये धैर्य से एक-दूसरे की बातें सुनना। अपने अनुमान को जाँचना, उस पर मनन करना, और आवश्यक लगने पर अपनी रीडिंग में परिवर्तन करना सहज बन सकता है।

पुस्तिका की सामग्री के ऐसे प्रयोग के लिये हम उपलब्ध रहने के प्रयास करेंगे। बिना किसी झिझक के हम से सम्पर्क करें।

—25/02/2022

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